दुर्भाग्यशाली व्यक्ति सदैव विपत्तियों से ग्रस्त रहता है
“खल्वाटो दिवसेश्वरस्य किरणैः सन्तापिते मस्तके,
गच्छन् देशमनातपं द्रुतगतिस्तालस्य मूलं गतः ।
तत्राप्यस्य महाफलेन पतता भग्नं सशब्दं शिरः,
प्रायो गच्छति यत्र दैवहतकस्तत्रैव यान्त्यापदः ।।”
भर्तृहरि जी कहते हैं दुर्भाग्यशाली व्यक्ति जहाँ भी जाता है, मुसीबतें उसके पीछे-पीछे चलती हैं । जैसे, एक दुर्भाग्यशाली गंजा व्यक्ति सूर्य की किरणों से सिर के तपाए जाने पर आहत होकर छायायुक्त स्थान पर जाता है, तभी उस वृक्ष से कोई बड़ा फल टूट कर उसके सिर पर गिरता है और उसका सिर फूट जाता है ।
निश्चित है कि अभागे व्यक्ति को कहीं भी भाग्य का सहारा नहीं मिलता । वह जहाँ-जहाँ जाता है, विपत्तियाँ उसके पीछे-पीछे चलती है ।
“खल्वाटो दिवसेश्वरस्य किरणैः सन्तापिते मस्तके,
गच्छन् देशमनातपं द्रुतगतिस्तालस्य मूलं गतः ।
तत्राप्यस्य महाफलेन पतता भग्नं सशब्दं शिरः,
प्रायो गच्छति यत्र दैवहतकस्तत्रैव यान्त्यापदः ।।”
भर्तृहरि जी कहते हैं दुर्भाग्यशाली व्यक्ति जहाँ भी जाता है, मुसीबतें उसके पीछे-पीछे चलती हैं । जैसे, एक दुर्भाग्यशाली गंजा व्यक्ति सूर्य की किरणों से सिर के तपाए जाने पर आहत होकर छायायुक्त स्थान पर जाता है, तभी उस वृक्ष से कोई बड़ा फल टूट कर उसके सिर पर गिरता है और उसका सिर फूट जाता है ।
निश्चित है कि अभागे व्यक्ति को कहीं भी भाग्य का सहारा नहीं मिलता । वह जहाँ-जहाँ जाता है, विपत्तियाँ उसके पीछे-पीछे चलती है ।
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